आधी अधूरी बात मानने का फल

एक बार एक चोर को राजा के महल में चोरी करते पकड़ लिया और जब उसे दरबार में हाजिर किया तो राजा ने कहा तुमने चोरी क्यों की। तुम्हें इस अपराध का दंड दिया जायेगा । क्या तुम अपनी सफाई मई कुछ कहना चाहते हो।
तो चोर ने कहा – महाराज मैं मानता हूँ की मैंने चोरी की है और मुझे सजा मिलेगी परन्तु मेरे साथ – साथ स्वामी परमानंद को भी सजा मिलनी चाहिए क्योंकि यह चोरी मैंने उन्हीं के प्रवचन से प्रेरित होकर की है जितना में अपराधी हूँ उतने ही स्वामी जी भी अपराधी है इसलिए मेरे साथ उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए।
राजा – ये क्या कह रहे हो ? वो तो गुरु है उन्हें धन की क्या जरूरत है जो वो तुमको चोरी करने को कहेंगे वो तो हमारा दिया हुआ दान ही गरीबों में बाँट देते है ।
तुम अपने को बचाने के लिए झूठ बोलते हो ताकि उनका नाम सुनकर हम तुम्हें छोड़ दें ।
परन्तु ऐसा नहीं होगा ।
चोर ने कहा महाराज में बिलकुल सच कह रहा हु। कि मुझे इस चोरी के लिए उन्होंने ही प्रेरित किया है।
राजा – स्वामी परमानंद को बुलाया जाए और हमें तुम्हारी बात पर बिलकुल भी विश्वास नहीं है ।
स्वामी ने दरबार में आकार चोर से कहा – मैंने तुमको कब कहा की तुम चोरी करो ?
चोर ने कहा – एक बार मैं रास्ते जा रहा था और आप लोगों से कह रहे थे कि जिस काम को करने से तुम्हें सुख , ख़ुशी ,आंनद मिले वही काम करना चाहिये ।
तो मुझे सबसे ज्यादा ख़ुशी तो चोरी करने में मिलती है इसलिए मैंने चोरी की ।

स्वामी परमानंद ने कहा – तुमने मेरी आधी बात सुनी थी मैंने कहा था कि आप लोगों से कह रहे थे कि जिस काम को करने से तुम्हें सुख , ख़ुशी ,आंनद मिले व जिस काम को तुम अच्छे से क्र सको वही काम करना चाहिये । परन्तु वह काम कभी नहीं करना चाहिए जिस से किसी को हानि , दुःख ,कष्ट, पीड़ा, हो ।
तुमने पहले वाली लाइन सुनी और चोरी कर ली यदि तुम मेरी पूरी बात सुनते तो आज इस मुसीबत में नहीं पड़ते चोर को राजा के यहां चोरी करने के लिए सजा सुनाई गई।

दोस्तों ऐसा बहुत बार हमारे जीवन में भी होता है कि हम किसी बात घटना या किसी के कही हुई कोई बात को पूरा सुने और उसकी सच्चाई जाने बिना जब भी हम कोई फैसला ( DECISION ) ले लेते है
या कोई धारणा बना लेते है कि ये आदमी घटना ( INCIDENT ) वस्तु सही नहीं है तो शायद कई बार बाद में अफ़सोस होता है
इसलिए आधी अधूरी बात माने या काम करने से बाद में निराशा हाथ लगती है
कभी जीवन में नकारात्मक ( NEGATIVE) ) सोचना और करना नहीं चाहिए । कोई भी हमें ये सोचने व समझने के बाद की इसके क्या परिणाम होंगे तभी करना चाहिए ।

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