चिंता का हमारर जीवन पर प्रभाव

राजनगर में हर सप्ताह जीवन से जुड़े एक विषय पर चर्चा होती थी इस सप्ताह चर्चा का विषय था चिंता ।
हर बार की तरह इस बार भी शुरुआत महामंत्री ने की वे बोले की चिंता आज के जीवन की गम्भीर समस्या है चिंता हमारे शरीर के साथ साथ ,मन व बुद्धि को खा जाती है । चिंता की हानि के लिए ये कहना सही है कि यह हाथी के शरीर को भी खत्म कर सकती है हर किसी ने चिंता के बारे में अलग अलग विचार दिए । राज्य के पहलवान ने कहा में चिंता को बड़ी बात नही समझता हूं । मेरा मानना है कि चिता जैसी कोई चीज नही होती कम से कम यह मेरे शरीर पर तो कोई असर नही गिरेगी और न ही मेरी पहलवानी पर ।
मैं नही मानता की यह हाथी के शरीर पर कोई असर डालती होगी
महामंत्री बोले हम आप के बारे में जानते है आप राज्य के सबसे शक्तिशाली पहलवान है आज तक आप से कोई नही जीत सका है पर आप का मत गलत है कि चिंता से कोई फर्क नही पड़ता है । चिंता हमें पतन की और ले जाती है ।
पहलवान ने कहा मैं आप की बात मानने को तैयार नही हूं अगर आप सही कह रहे हो तो आप यह सिद्ध कर के दिखाओ मैं तभी मानुगा ।

महामंत्री ने कहा अगर ऐसा है तो ढीक है मैं आप को एक काम सौंपता हूं आप को एक दीपक जलाकर रखना होगा अपने घर में और उसे किसी भी हालत में बुझने नही देना होगा । वह दीपक आपको को 24 घण्टे जलाकर रखना होगा । इस आप को कुश्ती होने तक करना होगा जिसमें अभी दो माह बाकी है । मेरा मानना है कि ऐसा करने से आप अगली कुश्ती में है बार की तरह जीत नही पाएंगे ।
पहलवान हँसा और बोला मैं ऐसा करने को तैयार हूं पर मैं अब भी खाता हूं कि ऐसा करने से मुझ पर कोई असर नही पड़ेगा और मैं हर बार की तरह इस बार भी जीतूंगा ।
महाराज बोले हम भी देखते है कि कोन इस विषय पर जीत हासिल कर पता है । एक सिपाही पहलवान के घर पर देखेगा की इसने दीपक को बुझने तो नही दिया और हम खुद दीपक को पहलवान के घर जाकर जलाएंगे ।

अगले दिन दीपक जला दिया गया और महाराज के आदेश अनुसार इस सिपाही को दीपक पर नीघा रखने के लिए वहां नियुक्ति किया । उसका काम था अगर पहलवान से दीपक बुझ गया हो वह हार जाएगा और इस बात को वह राजा को बताएगा ।

अब पहलवान उस दीपक को हर घंटे में देखता कही वह बुझ तो नही गया कही दीपक का तेल तो खत्म नही हो गया । अब वह अपनी कसरत पर भी सही तरह ध्यान नही दे पता था । उसे बस इस बात का ध्यान रहता की वह दीपक न बुझ जाए और वह हार न जाए । जैसे जैसे समय कुश्ती का समय कम रहता गया उसे अब और भी चिंता होने लगी कि उसने इस दीपक को इतने समय से बुझने नही दिया अगर यह अंतिम कुछ दिनों में बुझ गया हो उसकी सारी महेनत बेकार जाएगी । अब उसे नींद सही तरह से भी नही आती थी उसका शरीर भी कमजोर हो चूका था ।

उसने दीपक को तो जलाकर रखा पर वह कुश्ती में हार गया ।
अब उसे महामंत्री की बात पर पूरा यकीन हो गया की चिंता इंसान तो क्या हाथी के शरीर को भी खा जाती है ।
अगले दिन पहलवान ने सभा में खा अब मैने देख लिया की चिंता किस तरह हमारे जीवन का नाश के सकती है
मैं महामंत्री जी की बात से बिलकुल सहमत हूं । इतना कहकर पहलवान अपने स्थान पर बैठ गए ।
और हर बार की तरह आज भी एक नई चर्चा शुरू हुई ।

तो दोस्तों चिंता के बारे में एक लाइन में यह कहा जा सकता है यह हमारा विकास नही होने देती किसी भी क्षेत्र में और यह हमें पतन की और ले जाती है । चिंता चिता समान है ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here