कुलदीप धनी परिवार का लड़का था । उसका पालन पोषण एक राजकुमार की तरह हुआ था । उसे कभी किसी चीज की कमी महसूस होने नही दी थी ।
वह यह समझने लगा की सब उसके गुलाम हैं उसका व्यवहार सबके साथ बुरा था । वह किसी का सम्मान व् आदर नही करता था । इसकी इसी बात से उसके पिता परेशान रहते थे । उन्हें यह डर सततता रहत था कि यह मेरे बाद मेरे करोबार व सम्पन्ति को नही सँभाल पाये गा मेरे सारे कारोबार को यह बर्बाद कर देगा । यह समस्या उहोंने अपने एक मित्र को बातई उसके मित्र ने उन्हें उसे एक सलाह दी ।
अगले दिन कुलदीप को बुलाकर उसके पिता ने कहा में तीर्थ यात्रा पर जा रहा हूँ आज से तुम कारोबार को संभालोगे ।
अगले दिन से कुलदीप ने कारोबार सँभालना शुरू कर दिया अपने स्वभाव के अनुसार वह सभी नोकरो व ग्राहकों से बत्तमीजी से बात करता जिसमें ग्रहाक धीरे धीरे कम होने लगे और नोकर भी उसे छोड़कर जाने लगे कारोबार में कुलदीप को घाटा होने लगा । वह चिंतित होने लगा की ऐसा क्यों हुआ की हमे कारोबार में घाटा हो गया ।
कुछ दिन बाद में जब कुलदीप के पिता आये तो कुलदीप ने उन्हें सारे कारोबार व उसमें हुये घाटे के बारे में बताया ।
उसके पिता ने कहा बेटा मुझे पता हैं में तुम्हे ही समझाने के लिये तीर्थ पर गया था जो तुम्हारा व्यवहार हैं वही तुमारी तरक्की में बाधा हैं यदि तुम अपने साथ के लोगों के साथ बुरा तो जीवन में कभी भी सफल नहीं हो पाओगे
तुम अपने बर्ताव को सुधारो तुम्हारा व्यव्हार ही तुमारी सफ़लता का रहस्य हैं ।
कुलदीप अपने पिता की बात को समझ गया वह कारोबार को मन व अच्छे व्यव्हार के साथ करने जल्द ही उसने पहले से भी अच्छी तरक्की कर ली ।

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