बुरी आदत को छोड़ने का तरीका

संत मोहनदास ने कुछ ही दिनों पहले चन्दन नगर में आकर अपना आश्रम बनाया था उनकी अच्छाई व्
कर्मों की चर्चा हर जबान पर थी। एक दिन शाम के समय एक व्यक्ति संत के पास हताश होकर आया
प्रणाम करने के बाद उसने संत से कहा की मुझे नशे और जुआ की ऐसी लत लगी कि मैंने अपने सारा
धन गवा दिया अब भी इतना सब कुछ होने के बाद भी में इस नशे और जुआ की गन्दी लत को छोड़
नहीं पा रहा हूँ। आब आप ही मेरे दुःख का निवारण करे । कुछ ऐसा मंत्र दे की मेरी ये गन्दी आदत
छूट जाए संत मोहनदास ने कहा अभी तो मैं ध्यान कर रहा हूँ आप ऐसा करे की कल शाम के समय आए।
अगली शाम जब युवक आश्रम पहुँचा तो उसने कहा कि मैं आ गया अब आप बताए संत ने कहा मैं अभी आता हूं इतना कहकर वे कुटिया के अंदर चले गए । जब बहुत देर के बाद भी वे नही आए तो उस युवक ने अंदर जाकर देखा कि संत ने एक लकड़ी को पकड़ रखा है उस ने कहा कि मैं आप का बहार इंतजार कर रहा था ।
संत ने कहा बहार ही आ रहा था कि मुझे इस लकड़ी ने पकड़ लिया। युवक हँसने लगा और बोला कि आप मुझसे मजाक क्यों कर रहे है आप ने इस लकड़ी को पकड़ा हुआ है आप जब चाहे इसे छोड़ सकते है ।
इतना सुन कर संत मोहनदास बोले ठीक उसी तरह तुमने शराब और जुआ की गंदी आदत को पकड़ा हुआ है।
जब तुम इन्हें छोड़ना चाहो छोड़ सकते हो तुम ने इन बुरी आदतों को पकड़ रखा है न कि बुरी आदतों ने तुम्हें।
अब बात युवक कि समझ मैं आ चुकी थी । उसने संत को प्रणाम किया और बोला मुझे समझाने के लिए आप का मैं आभारी हूं और खुशी घर की तरफ चल दिया।

बुरी आदतें कपड़ों की तरह होती है जिन्हें हम खुद ग्रहण करते है इन्हें हम जब चाहे छोड़ सकते है। इन्हें छोड़ने के लिए हमें खुद ही संकल्प करना पड़ता है । बुरी आदतें किसी बीमारी की तरह नही है कि जो दवाई लेने से सही हो जाए । इन आदतों से छुटकारा पाने के लिए हमें खुद ही महेनत व संकल्प करना पड़ता है।

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