सफलता का मन्त्र

हमेशा की तरह दीना आज़ भी अपने दोस्त से यही कह रहा था कि हम एक जैसे परिवार से है एक गुरुकुल में हमने शिक्षा , एक साथ प्राप्त की परन्तु भाग्य का अनोखा खेल है कि तुम एक सफल व्यापारी के यहाँ मुनीम बन गए हो और मैं आज भी अपनी योग्यता के अनुसार कोई काम नहीं कर पा रहा हूँ यह मेरा दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है दीना की इन बातों को सुन कर आज भी उसका दोस्त मोहन हमेशा की तरह कोई भी ऐसा जवाब नहीं दे पाया जिसे उसका मित्र मान लेता
उन दोनों की बहस को सुनती हुई दीना की पत्नी रसोई से बाहर निकल कर बोली आप दोनों का तो यही काम है एक साथ होते ही बहस करना । उन्हीं दिनों महात्मा बुद्ध उस नगर में ही थे । दीन की पत्नी ने सुझाव दिया की आप दोनों अपनी ये बहस महात्मा जी के पास ले जाए ।
अगली सुबह दोनों महात्मा बुद्ध के आश्रम पहुँचे महात्मा के दर्शन के बाद दोनों ने अपने बीच बहस को महात्मा के सामने रखा व उनसे समाधान बताने के लिए प्रार्थना की ।महात्मा बुद्ध ने उन से कहा आप लोग चिंता मत करो मैं आप की बहस का समाधान सुबह बताऊँगा और साथ ही उनसे प्रार्थना की इन के आश्रम में आज काम करने वालो की कमी है अगर वे दोनों आज इनके आश्रम में काम मे हाथ बता दे बहुत अच्छा होगा । दोनों ने ख़ुशी- ख़ुशी हामी भर दी ।
महात्मा ने उन्हें आश्रम को साफ करने , खाना परोसने ,व झूठी पतले उठने का काम मिला ।
दोनों अपने अपने कामों में लग गए । मोहन जिस भी काम को करता मन लगा कर व ख़ुशी ख़ुशी करता पर दीना ने किसी भी काम मे रुचि न दिखाई । बस उसे तो शाम होने का इंतज़ार था ।
वो किसी भी काम को समय पर व सही नही कर पाया । मोहन के काम की सभी ने प्रसंशा की थी पर साथ ही साथ दीना को प्रसंशा के स्थान पर निराशा हाथ लगी ।
सुबह दोनों को महात्मा ने बुलाया और समझाया की सफलता केवल शिक्षा से नही मिलती अपितु शिक्षा के साथ साथ हमारे व्यवहार व काम करने के ढंग से भी मिलती हैं। मोहन को जो सफलता मिली है । वह उसे काम करने के ढंग व उसकी लगन के कारण मिली है । तुम अपने काम को मन लगा कर व रुची से नही करते इसलिए तुम अभी तक अच्छी सफलता को प्राप्त नही कर पाए । अगर तुम भी सही काम में मेहनत करो व उसे पुरी लगन से करोगे तो एक अच्छे मुकाम तक सफलता प्राप्त कर सकते हो ।। दीना को उसके सफल ने होने का कारण पता लग गया था । उसने महात्मा बुद्ध से कहा की अब से वह भी मन लगा कर किसी अच्छे काम को करेगा । दोनों दोस्तों ने महात्मा से घर जाने की आज्ञा ली व खुसी खुसी घर की तरफ चल पड़े । अब दोनों के बीच कोई बहस नहीं थी ।

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