1 .यदि एक अनन्त श्रखला में कुछ कड़ियां समझायी जा सकती है , तो उसी पद्धति से सब समझायी जा सकती है।

2 जिस प्रकार हाथी के दाँत बहार निकलते है ,परन्तु अंदर नही जाते,उसी प्रकार मनुष्य ने जो वचन एक बार मुख से निकाल दिये , वे वचन पुनः वापस नही जा सकते।

3 यदि तुम चाहते हो कि संसार तुम्हें सम्मान दे,तुम्हारे क़दमों पर झुके , तो तुम्हें पहले अपने ‘अहं’ (अहंकार) का नाश करना होगा।

4  संसार को आज धन की आवश्यकता नहीं। आज आवश्यकता है चरित्रवान एवं सच्चे मनुष्य की।

5 जब तक तुम स्वयं अपने में विश्वास नही करते , परमात्मा में तुम विश्वास नही कर सकते

6  संसार के प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि से भूल तो अवश्य ही होती है। किन्तु भूल को जीतने का प्रयत्न ही मनुष्य को महान बना देता है।

7  महान कार्य त्याग से ही सम्पन्न हो सकते है।

8   किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने से पहले सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

9  दूसरों के चरित्र  में बुराई न देखो ; क्योंकि बुराई अज्ञानता की पहली पहेली है।

10  ईर्ष्या तथा द्वेष का भाव मन से निकाल दो, अन्यथा नाश हो जाता है।

11 हमें ही सारे संसार के साथ मिल – झूलकर चलना होगा , सारा संसार कभी भी हमारे भाव के अनुकूल नही चल सकता ।

12  ज्ञान ही मनुष्य का प्रकृत जीवन है अज्ञान ही मृत्यु ।

13  आलस्य का प्रत्येक दशा में त्याग करना चाहिए। अन्यथा यह प्रगति नही होने देगा।

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